बुधवार, 1 सितंबर 2010

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर हार्दिक बधा‌ई और शुभकामना‌एं





फोटो सौजन्य से : krishna.com

रविवार, 15 अगस्त 2010

चौसठवें स्वतंत्रता दिवस पर सबको बधाई एवं शुभकामनाएं




मेरे कार्यस्थल पर स्वतंत्रता दिवस समारोह की झलकियां

















बुधवार, 11 अगस्त 2010

स्वतंत्रता दिवस पर मुद्दे ( १ ) : क्या भारत के प्रधानमंत्री का पद प्रशासनिक है या राजनैतिक ?


प्रश्न इसलिए कि जब श्री मनमोहन सिंह जी प्रधानमंत्री बने तो यह व्यवस्था बतायी गयी कि सोनिया जी यूपीए की अध्यक्ष के रूप मे पोलिटिकल मैनेजमेंट करेंगी और प्रधान मंत्री प्रशासनिक मैनेजमेंट करेंगे । उस समय कुछ सवाल जरूर उठे थे लेकिन तब के भावुकता भरे माहौल मे इस पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ । लेकिन अब जब कि यूपीए का दूसरा कार्यकाल शुरू हुए भी एक साल से ज्यादा हो गये हैं तो इस प्रश्न पर पूरी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए ।

प्रधानमंत्री का पद तो नितांत राजनैतिक मैनेजमेंट के लिए ही है , प्रशासनिक व्यवस्था के मैनेजमेंट के लिए तो कैबिनेट सेक्रेटरी होते हैं । दूसरी बात सरकार के मुखिया के तौर पर प्रधान मंत्री को सरकार के कार्यों के आधार पर अपनी पार्टी को चुनाव मे जनता के सामने भी ले जाना होता है और जवाब देना होता है । यह सरकार दुबारा चुन कर आयी है और कांग्रेस ज्यादा सीटों से जीत कर भी आयी है, लेकिन कहीं न कहीं जिस नैतिक उच्च मानदंड के साथ इस सरकार को राजनैतिक पहल करनी चाहिए थी वह दिखायी नही दे रहा है । जहां कहीं भी जिस निर्णायक राजनैतिक पहल की जरूरत है वहां पर यह सरकार बगलें झाकंते नजर आ रही है । चाहे नक्सलवाद का मामला हो , तेलंगाना का मामला हो , पाकिस्तान से संबंध का मामला हो, बलूचिस्तान मे भारत के गड़बड़ी फैलाने को लेकर पाकिस्तान का आरोप हो या कश्मीर का मामला हो । हर जगह यही नजर आ रहा है कि या तो केवल बात को टाला जा रहा है या बात बिगड़ रही है । वह पहल नही नजर आ रही जिसकी उम्मीद थी ।

प्रधान मंत्री भले ही एक राजनैतिक दल से चुना जाता हो परन्तु वह देश का मुखिया होता है । उसका व्यवहार स्टेट्समैन का होता है , उसे दूर द्रष्टा होना चाहिए । आज इन बातों का अभाव दिख रहा है । क्या इसका कारण यह है कि प्रधानमंत्री जो कि राज्यसभा से हैं और उन्होने कभी भी लोकसभा का चुनाव नहीं जीता है ऐसे मे वह नैतिक बल नहीं जुटा पा रहे हैं जो कि इसके पहले के प्रधानमंत्री कर सकते थे जैसे इन्दिरा जी , राजीव जी या फिर नरसिंहाराव जी और वाजपेयी जी हों । जब कि गंभीर और दूरगामी प्रभाव वाले मसले पर जब राजनीतिक आम सहमति बनानी होती है तो प्रधानमंत्री जी को स्वयं के बजाय सोनिया जी पर निर्भर रहना पड़ता है । इसलिए उन्हे पहले वहीं पर ही जूझना पड़ता है । यह बात हम सब न्यूक्लियर डील के मुद्दे पर देख चुके हैं जब प्रधानमंत्री को इस्तीफे की धमकी तक देनी पड़ी थी , तब कहीं जा कर उन्हे पार्टी का समर्थन मिला था । ऐसे मे यह तो जाहिर है कि इस तरह की धमकी कितनी बार दी जा सकती है । इसलिए ज्यादातर मसलों पर कोई निर्णायक पहल के बजाय किसी तरह टाइम काटने वाला रवैया ज्यादा लग रहा है ।


इन हालातों मे क्या यह उचित नहीं होगा कि देश को ऐसा प्रधानमंत्री मिले जो राजनैतिक हो , राजनैतिक मैनेजमेंट भी करे और स्टेट्समैन की तरह राजनैतिक इनीसियेटिव ले ।


( १५ अगस्त आने वाला है इस अवसर पर कुछ मुद्दे जिन पर हमे निरपेक्ष भाव से विचार करना चाहिए - इसी श्रंखला में पहला लेख )

रविवार, 1 अगस्त 2010

मैत्री दिवस

मैत्री दिवस पर अपने सब मित्रों के नाम , जिनके बिना यह जीवन निरर्थक होता, मै दो महाकवियों गोस्वामी तुलसी दास और राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की रचना उद्‍धृत कर रहा हूं :

१. राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर रचित रश्मि रथी से जहां श्री कृष्ण से संवाद के दौरान कर्ण के मुख से कवि ने मैत्री का अति सुन्दर बखान किया है :

मैत्री की बड़ी सुखद छाया,
शीतल हो जाती है काया,

धिक्कार योग्य होगा वह नर ,
जो पाकर भी ऐसा तरुवर,

हो अलग खड़ा कटवाता है ,
खुद आप नहीं कट जाता है ।


जिस नर की बाँह गही मैने,
जिस तरु की छाँह गही मैने,

उस पर न वार चलने दूंगा,
कैसे कुठार चलने दूंगा ?

जीते जी उसे बचाउंगा,
या आप स्वयं कट जाउंगा ।

मित्रता बड़ा अनमोल रतन,
कब इसे तोल सकता है धन ?

धरती की है क्या बिसात ?
आ जाय अगर बैकुंठ हाथ,

उसको भी न्योवछवर कर दूं,
कुरुपति के चरणों मे धर दूं ।



२. गोस्वामी तुलसी दास कृत श्री राम चरित मानस के किष्किन्धा काण्ड से जहां श्री राम संवाद के दौरान सुग्रीव को अपनी मित्रता का भरोसा दिलाते हुए मित्र के गुणों का अति सुन्दर बखान कर रहे हैं :


जे न मित्र दुख होहिं दुखारी,
तिन्हही बिलोकत पातक भारी।

निज दुख गिरि सम रज करि जाना,
मित्र क दुख रज मेरु समाना ।

जिन्हके अस मति सहज न आई ,
ते सठ कत हठि करत मिताई ।

कुपंथ निवारि सुपंथ चलावा ,
गुन प्रकटै अवगुनहिं दुरावा ।

देत लेत मन संक न धरई ,
बल अनुमानि सदा हित करई ।

बिपत काल कर सतगुन नेहा ,
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।

आगे कह हित वचन बनाई ,
पीछे अनहित मन कुटिलाई ।

जाके चित एहि गति सम भाई ,
अस कुमित्र परिहरेहिं भलाई ।

सेवक सठ नृप कृपन कुनारी ,
कपटी मित्र सूल सम चारी ।

सखा सोच त्यागहु बल मोरे ,
सब बिधि घटब काज मैं तोरे ।



मैत्री दिवस पर सबको हार्दिक शुभकामनाएं ।

मरीचिका का पुनर्जन्म

दिन पहले की बात है , मुझ कई मित्रों ने SMS किया और कई ने इमेल पर लिखा कि मेरा ब्लॉग मौजूद नही है , जब मैने चेक किया तो पाया कि गूगल ने मेरा ब्लॉग हटा दिया है । कुछ जानकारी उनको देने के बाद यह आश्वासन दिया गया कि जांच के बाद पुन: इसे चालू किया जायेगा ।

इस बीच मैने ज़ाकिर अली जी के ब्लॉग "तस्लीम" पर पूछा भी , क्यों कि मैने सुन रखा था कि अर्शिया जी के ब्लॉग के साथ भी ऐसा हो चुका था । ज़ाकिर जी ने बताया कि थोड़ा समय लगेगा और जांच के बाद चालू हो जायेगा । आज फ्रेन्डशिप डे के दिन, यह ब्लॉग तीन दिन बाद गायब रहने के बाग फिर से वेब पर उपलब्ध है । इस बीच सभी मित्रों को धन्यवाद देता हूं जिन्होने इमेल या SMS स से सम्पर्क किया । आशा है अब यह हमेशा मौजूद रहेगा ।

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

वाह सचिन

आज जब अनेक अशांत कर देने वाले समाचारों से दिन अटा पड़ा है , इस सब के बीच एक समाचार मन को सुकून देने वाला मिला , सचिन का दोहरा शतक जो उन्होने श्रीलंका के विरुद्ध दूसरे टेस्ट मे लगाया , जो उनका अड़तालिसवां शतक भी है ।

मैं स्कूल और कालेज के दिनो मे क्रिकेट पर बहुत ज्यादा केंद्रित रहता था, अन्य खेल भी देखता सुनता था लेकिन क्रिकेट हर भारतीय की तरह मुझे भी दीवाना बनाता था । हर खिलाड़ी का रिकार्ड और पोस्टर अपनी फाइल मे रखना और उसे अपडेट करते रहना एक तरह से डियुटी सा होता था । लेकिन धीरे धीरे शायद उम्र का असर हो या शायद फिक्सिंग के आरोप का असर, इस खेल से मन थोड़ा दूर हो गया । अब तो बस कुछ खास हुआ तो नज़र दौड़ा लेता हूं ।

लेकिन इन सब से अलग सचिन के लिए सम्मान कभी भी कम नहीं हुआ । जब कभी भी उन पर किसी ने विवाद उठाने की कोशिश की, वह स्वयं विवादित हो गया लेकिन सचिन निर्विवाद ही रहे । उदाहरण के लिए साउथ अफ़्रिका मे गेंद पर नाखून लगाने का मामला हो, आस्ट्रेलिया मे हरभजन के विवाद मे उन्हे खीचने का मामला हो या अभी ताजा ताजा बाल ठाकरे का लेख हो । इसका कारण है उनका खेल के प्रति अगाध प्रेम और फ़ोकस । उन्हे समाचारों मे रहने के लिए ज़ुबान नही बल्ला चलाने का शौक है । मै उनके रिकार्ड पर नही लिखना चाहता वो सब जानते हैं । बस यह कहना चाहता हूं कि सत्रह साल की उम्र से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले सचिन आज सैंतिस साल के सचिन उतने ही फ़िट हैं और उतना ही फ़ोकस्ड हैं यही उअनकी महानता का राज़ है । उनकी वजह से हम जैसे व्यक्ति भी फ़िक्सिंग विवाद के बाद भी इस खेल से जुड़ सक रहे हैं । आखिर उन्हे क्रिकेट का भगवान ऐसे ही नहीं कहा जाता है ।

इस परेशानी भरे जीवन मे खुशी का एक मौका देने और भारतीय होने पर गर्वान्वित होनी का मौका देने के लिए मै सचिन को धन्यवाद देता हूं । ऐसे व्यक्तित्व हमारा देशवासी है इस पर नाज़ करता हूं ।

शुक्रवार, 25 जून 2010

एक थे बांका के दिग्विजय सिंह

मेरा मानना है कि श्री दिग्विजय सिंह जी कुछ ऐसे राज नेताओं मे से थे जो आम जनता की लड़ाई लड़ते थे । अपने वचन के पक्के थे । अपने सम्बन्ध लाभ हानि के हिसाब से नहीं तय करते थे । सही बात के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे । उन्होने जार्ज साहेब के लिए पार्टी से लड़ाई की , जार्ज साहेब के साथ तब खड़े थे जब पूरी पार्टी उनसे किनारा कर रही थी । दिग्विजय जी चन्द्रशेखर जी के करीबी थे , परन्तु ध्यान दीजिए, वी पी सिंह जी के निधन के बाद उनके अन्तिम संस्कार मे शामिल होने वाले चंद लोगो मे से एक दिग्विजय जी थे , जब कि मीडिया भी उस समय मुम्बई पर आतंकवादी हमलों पर केंद्रित था और बाकी लोग भी ।


राज्य सभा की सीट से इस्तीफ़ा दे कर लोक सभा निर्दलीय लड़ना , नितीश कुमार के विरोध के बाद भी जीतना , उनके बारे मे सब कुछ बता जाता है । वे बिहार मे एक नया किसान आन्दोलन खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे वह शायद अब रुक जाये । ऐसे व्यक्ति का असमय जाना देश के लिए एक अपूर्णीय क्षति है ।

ईश्वर उनकी आत्मा को शांति और उनके परिवार को इस दुख को सहने की क्षमता प्रदान करे यही प्रार्थना है ।